राजस्थान में पूरे नहीं होंगे भाजपा के मंसूबे

-रमेश सर्राफ धमोरा-

राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और पूर्व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के मध्य चल रही राजनीति खिंचातान का भाजपा फायदा उठाना चाहती है। कर्नाटक और मध्य प्रदेश की तरह राजस्थान में भी भाजपा कांग्रेस के दो बड़े नेताओं की लड़ाई का फायदा उठाकर अपनी सरकार बनाना चाहती है। मगर राजस्थान में भाजपा के मंसूबे शायद ही पूरे हो। यहां पर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी माने जाते हैं। गहलोत तीन बार केंद्रीय मंत्री, तीन बार प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व तीसरी बार मुख्यमंत्री बनकर प्रदेश में शासन चला रहे हैं। कर्नाटक व मध्य प्रदेश के अपदस्थ मुख्यमंत्रियों की तुलना में गहलोत का राजनीतिक अनुभव भी बड़ा है तथा उनके पास विधायकों का बहुमत भी पर्याप्त है। ऐसे में राजस्थान की कांग्रेस सरकार को गिरा पाना भाजपा के बस में नहीं लग रहा है। इसीलिए भाजपा ने अपने ऑपरेशन राजस्थान को स्थगित कर दिया है।

एक साल पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को हटाने की मांग करते हुए अपने अट्ठारह अन्य समर्थक विधायकों के साथ हरियाणा के गुड़गांव के एक होटल में डेरा डालकर प्रदेश सरकार को संकट में डाल दिया था। उस समय पायलट मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को हटाकर खुद मुख्यमंत्री बनना चाहते थे। पायलट अपने समर्थक विधायकों के साथ करीबन एक महीने तक गुड़गांव के होटल में डेरा डाले रहे। इसी दौरान कांग्रेस आलाकमान ने सचिन पायलट को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष व उपमुख्यमंत्री पद से तथा उनके समर्थक दो अन्य मंत्रियों महाराजा विश्वेंद्र सिंह व रमेश मीणा को कैबिनेट मंत्री पद से बर्खास्त कर दिया था।
उस समय चर्चा थी कि पायलट की बगावत के पीछे भाजपा के बड़े नेताओं का हाथ था। भाजपा नेताओं ने पायलट को आश्वस्त किया था कि गहलोत सरकार गिराने के इनाम स्वरूप उनको भाजपा कोटे से मुख्यमंत्री बना दिया जाएगा। मगर पायलट को लेकर गहलोत शुरू से ही सतर्क थे। इसी का नतीजा था कि पायलट की बगावत फेल हो गई। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने समय रहते पायलट समर्थक कई विधायकों व मंत्रियों को तोड़कर अपने खेमे में मिला लिया था। इस कारण पायलट पर्याप्त संख्या बल नहीं जुटा पाए। यदि पायलट गुट के सभी विधायक उस समय पायलट के साथ रहते तो गहलोत सरकार का गिरना निश्चय था। मगर गहलोत की सतर्कता से उनकी सरकार गिरने से बच गई थी।
सचिन पायलट की बगावत के बाद कांग्रेस आलाकमान ने तीन वरिष्ठ नेताओं अहमद पटेल, केसी वेणुगोपाल व अजय माकन की एक समिति बनाई थी। इस कमेटी को अशोक गहलोत व सचिन पायलट की बातों को सुनकर उनमें तालमेल बैठाना था। मगर अचानक ही कोरोना से कमेटी के वरिष्ठ सदस्य अहमद पटेल का निधन हो गया। इस कारण इस समिति की कोई बैठक नहीं हो पाई। इसी दौरान केंद्रीय नेतृत्व के निर्देश पर प्रदेश कांग्रेस कमेटी में पायलट समर्थक नेताओं को पर्याप्त महत्व देते हुये पदाधिकारी बनाया गया था। लेकिन पायलट की मुख्य मांग उनके समर्थक आठ विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल करने व अन्य को विभिन्न बोर्ड, आयोग, निगम में अध्यक्ष बनाकर मंत्री स्तर का दर्जा दिया जाने की है। इसके अलावा अन्य राजनीतिक नियुक्तियों में भी पायलट समर्थकों को पर्याप्त तवज्जो दी जाए।
देश में अचानक ही कोरोना की दूसरी लहर आने से राजस्थान में लंबे समय तक लाक डाउन लगाना पड़ा। ऐसे में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मंत्रिमंडल विस्तार व राजनीतिक नियुक्तियां करने की बजाय कोरोना मैनेजमेंट पर फोकस रखा तथा पूरे संसाधनो से कोरोना की दूसरी लहर का मुकाबला किया। इस दौरान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व उनकी पत्नी सुनीता गहलोत भी कोरोना संक्रमण की चपेट में आ गए थे। कोरोना संक्रमण से बाहर निकलने के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कोरोना के बाद होने वाली विभिन्न तरह की बीमारियों को ध्यान में रखते हुए चिकित्सकों की सलाह पर एक से दो माह तक किसी भी व्यक्ति से व्यक्तिगत मिलने के कार्यक्रम को स्थगित कर दिया।
अब मुख्यमंत्री गहलोत मंत्रिमंडल की मीटिंग सहित अन्य सभी मीटिंग वर्चुअल माध्यम से ही कर रहे हैं। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मंत्रियों, अधिकारियों, वरिष्ठ चिकित्सकों व विशेषज्ञों के साथ कोरोना संक्रमण नियंत्रण के लिए मिटेंगे की उन मीटिंगों का सीधा प्रसारण सोशल मीडिया पर किया गया। जिसमें प्रदेश के लाखों लोगों ने लाइव मीटिंग को देखकर अपने सुझावों से अवगत कराया। मुख्यमंत्री के इस नवाचार की पूरे प्रदेश की जनता में सराहना हो रही है। गहलोत द्धारा आम जनता को सरकार के निर्णयों से जोड़ने से आमजन में प्रदेश सरकार की सकारात्मक छवि बनी है।
जहां भाजपा प्रदेश में गहलोत सरकार को गिरा कर अपनी सरकार बनाने का सपना देख रही थी। उसके विपरित इन दिनों भाजपा नेता आपस में ही एक दूसरे से उलझे हुए हैं। प्रदेश में वसुंधरा समर्थक मुखरता से वसुंधरा राजे को प्रदेश की कमान सौंपने की मांग कर रहे हैं। वही उनके विरोधी खेमे के नेता उनके स्थान पर नए लोगों को मौका देने की बात कर रहे हैं। इससे भाजपा के नेता कांग्रेस को भूल कर अपने लड़ाई लड़ने लगे हैं। वैसे भी प्रदेश की राजनीति में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत व पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे में बेहतर तालमेल माना जाता है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि गहलोत सरकार के संकट में आने की स्थिति में वसुंधरा समर्थक दो दर्जन विधायक गहलोत का साथ दे सकते हैं।
इन्हीं आशंकाओं के चलते भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने राजस्थान में ऑपरेशन कमल से अपना हाथ खींच लिया है। पूर्व में महाराष्ट्र में भी भाजपा नेतृत्व इसी तरह मात खा चुका है। इसलिए भाजपा ऐसा कोई काम करना नहीं चाहती है जिससे उस पर चुनी हुई सरकार को गिराने का आरोप लगे। पूर्व में कर्नाटक व मध्य प्रदेश में कांग्रेस सरकार गिराने से भाजपा को काफी आलोचनाएं झेलनी पड़ी थी।
राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को राजनीति का जादूगर यूं ही नहीं कहा जाता है। उन्होंने सरकार बनाते ही बसपा के सभी छः विधायकों के कांग्रेस में शामिल करवा कर कांग्रेस विधायकों की सदस्य संख्या 106 कर स्पष्ट बहुमत प्राप्त कर लिया था। उसके बाद उन्होंने माकपा के दो, भारतीय ट्राइबल पार्टी के दो, राष्ट्रीय लोक दल का एक व 14 निर्दलीय विधायकों का भी समर्थन हासिल कर बहुमत की सरकार चला रहे हैं।
सचिन पायलट भी बगावत कर अपनी ताकत आजमा चुके हैं। हाल ही में पायलट समर्थक विधायक महाराजा विश्वेंद्र सिंह, भंवर लाल शर्मा, प्रभु दयाल मीणा सहित कई विधायकों के गहलोत से जुड़ने की खबरें आ रही है। ऐसे में गहलोत को भी पायलट की ताकत का पता चल गया है। अब वह पायलट के किसी दबाव में आने वाले नहीं है। प्रदेश की मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य को देख कर तो लगता है कि राजस्थान में गहलोत सरकार गिराने के भाजपा के मंसूबे शायद ही पूरे हो। राजस्थान में अभी तो भाजपा के लिए अंगूर खट्टे हैं वाली स्थिति ही बनी रहने की संभावना नजर आ रही है।

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