• January 28, 2021

पॉलिसी से नीतियां गायब होना देशहित के साथ धोखाधड़ी

 पॉलिसी से नीतियां गायब होना देशहित के साथ धोखाधड़ी

डॉ. लखन चौधरी
देश में अब चतुराई से जनमानस को गुमराह करने की राजनीति चल रही है। चुनाव आने पर पाक-चीन सीमा विवाद, आतंकवाद का मसला उछालना राजनीति का शगल बन गया है। चुनाव नहीं रहने पर जाति-धर्म, वर्ग का कार्ड खेलना आम बात है। कोई सवाल-जवाब नहीं, कोई छान-बीन नहीं, जनता, मीडिया सब मस्त हैं, कुछेक को छोड़कर सब सो रहे हैं। क्या इसी तरह लोकतंत्र चलता है?प्रयास एवं त्रुटि पद्धति या प्रयोग जो श्ट्रायल एंड एररश् के नाम से लोकप्रिय है, का आजकल देश में बोलबाला है। सब जगह यही चल रहा है ट्रायल एंड एरर यानि किसी भी काम में जानकारी, दक्षता, ज्ञान, विशेषज्ञता हो या नहीं हो, कोई बात नहीं है। कोई भी काम, योजना, अभियान, मिशन कोई भी एक बढिय़ा सा नाम देकर मीडिया के हवाले से भारी-भरकम विज्ञापन के साथ प्रारंभ कर दीजिए या कर लीजिए। यदि विश्वास नहीं तो पूरा का पूरा देश देख लीजिए। त्रुटियां, गलतियां, प्रयास, प्रयोग यानि ट्रायल एंड एरर यही चल रहा है।

इसे आप विकास, प्रगति, उन्नति, संवृद्धि, आधुनिकता, उत्तर आधुनिकता कुछ भी नाम दे दीजिए, क्या फर्क पड़ता है? कभी विरोध में कोई आवाज उठे तो मुद्दा बदल कर नया विषय फेंक दीजिए। आजादी के 73 सालों बाद यानि स्वतंत्रता के सातवें दशक और 21वीं सदी में देश की तमाम संस्थाएं, संगठन, समूह और सभी सरकारें (केंद्रीय, राज्य, स्थानीय) ट्रायल एंड एरर पद्धति से चल रहे हैं। कहीं कोई ठोस नीतियां, दूरदर्शी योजनाएं एवं पुख्ता कार्यक्रम नजर नहीं आता है। यह देश के लिए अहितकर एवं हानिकारक भी है। आने वाले समय में देश के लिए यह स्थिति घोर अराजकता, अव्यवस्था, अशांति, असंतोष का जनक एवं कारण दोनों बन सकती है। एक तरफ देश के करोड़ों लोगों को दो वक्त का खाना नसीब नहीं हो पा रहा है, वहां प्रयोग के नाम पर राष्ट्रीय बजट का लगातार मनमानी दुरूपयोग किया जा रहा है।

इसलिए इस पर गंभीर विमर्श की जरूरत है, क्योंकि इससे सबसे बड़ा नुकसान देश की राष्ट्रीय संपदाओं की फिजूलखर्ची की है, वहीं देश बहुमूल्य प्राकृतिक साधनों एवं संसाधनों की भारी बर्बादी भी है। पिछले कुछेक सालों से देश में कारोबार, उद्योग-धंधे, रोजगार, बेकारी। अर्थव्यवस्था, शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी, भुखमरी, लाचारी, बेबसी, सामान्य जनजीवन, राजनीति, समाज, विचारधारा और भी बहुत कुछ आदि को लेकर जिस तरह की स्थितियां-परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं, वह संभलने,का संकेत दे रही हैं। नौकरशाही, अफसरशाही, बाबूओं के भरोसे देश को छोड़ दिया गया है। देश के थिंक टैंक या तो गायब हैं या उन्हें दरकिनार कर दिया गया है। पॉलिसी प्लानिंग या नीतियों, योजनाओं को लेकर कहीं कोई ठोस गंभीरता, सोच, दूरदर्शिता, दृष्टिकोण एवं दिशादर्शन नजर नहीं आता है। कोविड-19 महामारी से निपटने के मामले पर ही देख लिजिए। कोरोना संक्रमण के मामले पर देश तीसरे नम्बर पर आ चुका है, और सरकार निरर्थक मुद्दों को लेकर जनता को गुमराह करने में लगी है।

जब देश में सख्त तालाबंदी-लॉकडाउन की जरूरत है, तो पूरा खोल दिया गया और जब इसकी इतनी सख्त जरुरत नहीं थी, तब सख्ती बरती गई। देश के दिल्ली समेत कई महानगरों में मानवता कराह रही है और सरकारें मास्क-मास्क, सेनेटाईजर-सोशल डिस्टेंसिंग, पीपीई-अनलॉक 1, 2, 3, 4…खेल रही है। शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसे गंभीर मसलों को ले लीजिए। कोई ठोस कार्यक्रम, योजनाएं, नीतियां नजर नहीं आती हैं। कोविड-19 महामारी के बढ़ते मामलों से अब जब पोल खुलने लगी है तब आनन-फानन में तैयारियां की जा रही हैं। अब तो विकास का मुद्दा भी गायब है। अब तो वोट भी विकास के नाम पर नहीं मिलते हैं। राष्ट्रवाद, सेना, सरहद, युद्ध सामग्रियों की खरीदी ही बड़े मसले हैं।

जब जनता भी यही चाहती, पसंद करती है? तो कोई कर भी क्या सकता है? विपक्ष को खत्म कर दिया गया है, पद-प्रलोभन या इनका लालच देकर बुद्धिजीवियों का मुंह बंद कर दिया गया है, मीडिया को मैनेज कर लिया गया है तो आवाज कहां से आयेगी? कैसे आयेगी? फिर सब कुछ चंगा सी होना ही है। सवाल उठता है कि क्या यह सब सिर्फ ब्यूरोक्रेसी और मीडिया का खेल है? आम जनता एक कप चाय, एक टॉफी और तो और मात्र एक आश्वासन में बिक जाती है और बाद में रोते रहती है। ये क्या पूरा का पूरा खेल चल रहा है? ट्रायल एंड एरर का। गलत-सही कुछ भी योजनाएं, नीतियां और कार्यक्रम बनाइये। लोगों के खून-पसीने का पैसा पानी की तरह बर्बाद कर दीजिये और कुछ दिन बाद उसे सुधार के नाम पर बदल दीजिये। मजाल है कोई आवाज उठाए, कोई बाल बांका कर सके। और कभी कोई आवाज उठ गई तो मुंह बंद करने में कितनी देर लगती है? याद रहे सरकार चलाने के लिए या सरकार चलाने में श्ट्रायल एंड एररश् पद्धति का प्रयोग देश के लिए खतरनाक है, और पॉलिसी से नीतियां गायब होना दुखद एवं चिंताजनक है।


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