डॉ. श्रीगोपाल नारसन एडवोकेट-

देश के स्वास्थ्य मंत्री रहे और उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता काज़ी रशीद मसूद के निधन से उनके चाहने वाले आहत महसूस कर रहे है। वह पिछले काफी दिनों से बीमार चल रहे थे। 73 वर्षीय काजी रशीद मसूद के निधन से राजनीतिक हलक़ों,विशेषकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में शोक की लहर व्याप्त हो गई।

गत दिनों पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री रशीद मसूद की तबियत खराब होने और कोरोना रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद उन्हें दिल्ली अपोलो अस्पताल में भर्ती कराया गया था। स्वस्थ होकर वह घर भी लौट आये थे। लेकिन 5 अक्टूबर की सुबह सहारनपुर में उनकी फिर तबियत बिगड़ गई और उनका निधन हो गया । बाद में उन्हें सुपुर्द खाक कर दिया गया।

काजी रशीद मसूद को पश्चिमी उत्तर प्रदेश का बड़ा कद्दावर नेता माना जाता रहा है। कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष इमरान मसूद दिवंगत रशीद मसूद के भतीजे हैं। काजी रशीद मसूद पांच बार लोकसभा के सदस्य और चार बार राज्यसभा के सदस्य रहे । साथ ही उन्हें केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री पद को सुशोभित करने का अवसर भी मिला। उन्होंने पहला लोकसभा चुनाव आपातकाल के तुरंत बाद सन 1977 में लड़ा था। वह जनता पार्टी के टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे थे और ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। इसके बाद वह जनता पार्टी (सेक्यूलर) में शामिल हो गए। सन 1989 का चुनाव उन्होंने जनता दल से लड़ा और फिर जीत दर्ज की। इस दौरान वह सन 1990 से सन 1991 तक केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री रहे। सन 1994 में वह सपा में शामिल हो गए। बाद में समाजवादी पार्टी से किनारा करके उन्होंने सन 1996 में इंडियन एकता पार्टी बनाई। लेकिन सन 2003 में फिर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। सन 2004 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर लोकसभा का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। फिर वे कांग्रेस में आ गए। उन्हें अपने स्वास्थ्य मंत्री कार्यकाल के दौरान एमबीबीएस भर्ती अनियमितता मामले के आरोप में जेल भी जाना पड़ा। बाद में फिर समाजवादी पार्टी से जुड़ गए।सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव ने रशीद मसूद को सन 2007 में उप राष्ट्रपति का चुनाव भी लड़वाया था। वह संयुक्त राष्ट्रीय प्रगतिशील गठबंधन के प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़े थे। इस चुनाव में प्रतिभा पाटिल विजयी हुईं थी। मसूद 75 वोट हासिल कर तीसरे नंबर पर रहे थे।पूर्व केंद्रीय मंत्री काजी रशीद मसूद का परिवार 70 साल तक एकजुट था। उनके प्रमुख सिपहसलारों में इमरान मसूद शामिल थे। उस दौरान पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं, बल्कि केंद्र की राजनीति तक में इनकी तूती बोलती थी। परिवार की एकजुटता का ही परिणाम था कि इमरान मसूद सपा सरकार के दौरान नगरपालिका सहारनपुर के चेयरमैन चुने गए थे तथा उनके भाई नोमान मसूद गंगोह चेयरमैन रहने के दौरान लंबी लड़ाई के बावजूद अडिग रहे। बाद में इमरान मसूद ने अपनी सपा सरकार से ही बगावत कर वर्ष 2007 में मुजफ्फराबाद सीट से निर्दलीय चुनाव लड़कर जीत हासिल की थी। इसके बाद काजी परिवार कांग्रेस में शामिल हो गया था। कांग्रेस ने भी रशीद मसूद को भरपूर सम्मान दिया। काजी परिवार में फूट उस समय पड़ी जब सन 2012 के विधानसभा चुनाव में कैराना से काजी रशीद मसूद के पुत्र शाजान मसूद को हार का सामना करना पड़ा, इमरान भी नकुड़ में चुनाव हार गए। यही नहीं काजी परिवार का घमासान उस समय सड़क पर आ गया जब इमरान मसूद ने 2014 में लोकसभा चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी तथा समाजवादी पार्टी से टिकट भी हासिल कर लिया, जबकि काजी रशीद मसूद शाजान को लोकसभा चुनाव लड़ाने की तैयारी में थे। चुनाव से पूर्व इमरान मसूद की कथित साम्प्रदायिक सीडी प्रकरण हुआ, जिससे उन्हें जेल जाना पड़ा। इसका फायदा उठाते हुए काजी रशीद मसूद ने कांग्रेस में होने के बावजूद समाजवादी पार्टी से इमरान का टिकट कटवाकर अपने पुत्र शाजान मसूद को दिला दिया। जमानत पर आए इमरान मसूद ने कांग्रेस से टिकट हासिल कर लोकसभा का चुनाव लड़ा तथा दूसरे नंबर पर रहे, जबकि शाजान मसूद चौथे नंबर पर रहे और जमानत जब्त करा बैठे थे।

अपने इस पूरे राजनीतिक सफर में कांग्रेस नेता इमरान मसूद उनके साथ अधिकांश समय साए की तरह रहे। लेकिन सन 2014 की लोकसभा सीट के टिकट को लेकर चाचा भतीजे दोनो के बीच हुए मतभेदो ने उनके बीच दूरी बना दी । जिसपर काजी रशीद मसूद के बेटे शाजान मसूद ने लोकसभा चुनाव समाजवादी पार्टी के टिकट पर लड़ा तो कांग्रेस ने इमरान मसूद को मैदान में उतार दिया था। इस चुनाव में इमरान मसूद ने चार लाख से अधिक वोट लेकर सभी को चौंका दिया था। वहीं शाजान मसूद को मात्र 52 हजार वोटों पर ही संतोष करना पड़ा। उसके बाद काजी रशीद मसूद ने फिर पार्टी बदली और बसपा में शामिल हो गए। इस सबके साथ ही उन्हें लोकसभा के 1996, 1998, 1999 और 2009 के चु्नाव में हार का भी सामना करना पड़ा।यानि कह सकते है रशीद मसूद को अपने राजनीतिक जीवन मे कई उतार चढ़ाव देखने पड़े।बड़े कद का नेता होने और नो बार सांसद बनने के बावजूद उनकी बार बार दल बदलने की आदत ने उन्हें राजनीतिक नुकसान भी पहुंचाया और राजनीति के कारण ही घर मे भी दरार का मुंह देखना पड़ा।लेकिन उनका राजनीति में बड़ा मुकाम और उनकी साफ़गोई के लिए उन्हें लंबे समय तक याद किया जाएगा।


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