असहयोग आन्दोलन: सौ वर्ष पूर्व गांधी ने देश को आत्मा दी थी

डॉ. दीपक पाचपोर
आज हमारी सरकार निरंकुश शासकों का सा व्यवहार कर रही है। जिन कारणों से असहयोग आंदोलन छेड़ा गया था वे ब्रिटिश सरकार द्वारा उत्पन्न की गई थीं। आज निर्वाचित सरकार ही नागरिकों के अधिकार कुचल रही है। कोविड-19 की महामारी और उसके कारण बने हालातों से जूझते असंख्य श्रमिकों, गरीबों और मध्यवर्गीयों के सामने वैसी ही परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हैं। सरकार और सत्ता दल नागरिकों की कोई मदद न कर स्वयं मजबूत, खुदगर्ज और समृद्ध हो रहे हैं। मोहनदास करमचंद गांधी आजाद रहने का दूसरा नाम है। देश, समाज और मानव की स्वतंत्रता को पाने और उसे बनाये रखने के अनेक बाण उन्होंने अपने तरकश में रखे हुए थे। उनमें सबसे महत्वपूर्ण और मारक साबित हुआ करीब पौने दो साल चला असहयोग आन्दोलन। ठीक सौ वर्ष पहले, 1 अगस्त, 1920 को छोड़े गये इस तीर को अपना काम पूरा करने के पहले ही एक विशेष कारण से स्वयं गांधीजी ने तरकश में वापस रख दिया था, लेकिन इससे उनकी ऊंचाई महामानव की हो गई- देवताओं के समकक्ष।

असहयोग आंदोलन एक विपन्न देश के एकाएक साहसी और आजाद खयाल हो जाने का जरिया तो बना ही, उसने हमारे पूरे स्वतंत्रता आंदोलन को मानवीयता, नैतिकता और औदार्य का वह गुण प्रदान किया था, जिसने परवर्ती भारत की राजनीति और लोकतंत्र का एकदम नया चेहरा गढ़ा था। अगर इस आंदोलन की पृष्ठभूमि को देखें तो इसके कई कारण स्पष्ट हैं। पहले विश्व युद्ध ने पूरी दुनिया के साथ अन्य साम्राज्यवादी उपनिवेशों की तरह भारत में भी नई आर्थिक और राजनैतिक स्थितियां बनाई थीं। अंग्रेजों ने अपने रक्षा व्यय को पूरा करने के लिये करों में खूब बढ़ोतरी की। 1913 से 1918 के बीच वस्तुओं की कीमतें कई गुना हो गईं। देश के कई हिस्सों में फसलें खराब होने से महंगाई खूब बढ़ी। अंग्रेज सिपाहियों के साथ आए स्पेनिश फ्लू यानी इन्फ्लुएंजा से लाखों लोग मारे गये। इन कठिनाइयों के बीच लोगों की दिक्कतें दूर करने में अंग्रेज सरकार ने कोई मदद नहीं की जिससे लोगों का रोष बढ़ा। पहले महासमर के दौरान अंग्रेजों ने प्रेस पर प्रतिबंध और बगैर जांच किये सजा के प्रावधान लागू कर दिये थे। सर सिडनी रौलेट की अध्यक्षता वाली एक समिति की सिफारिशों के आधार पर इन कड़े कानूनों को लाया गया था, जिसके विरोध में गांधीजी ने देशव्यापी आंदोलन छेड़ दिया। इन्हें शैतानी, अत्याचारी और काले कानून की संज्ञाएं दी गई थीं। देश भर में बंद हुआ, खासकर पंजाब में प्रखर विरोध हुआ क्योंकि वहीं से बड़ी संख्या में लोग महायुद्ध में ब्रिटिश आर्मी की ओर से लड़े थे। वे अब इसके बदले में सदाशयता स्वरूप आजादी चाहते थे।

पंजाब जाते हुए गांधीजी गिरफ्तार हो गये। वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड के कार्यकाल में आये इस अधिनियम का उद्देश्य भारत में राजनीतिक गतिविधियों को दबाना था। 13 अप्रैल, 1919 को अमृतसर के जालियांवाला बाग हत्याकांड? ने देश को उद्वेलित कर दिया था। खिला$फत आंदोलन के जरिये देश में हिन्दू और मुसलमान पहले ही एक हो गये थे। बापू के आदेश पर विद्यार्थियों ने सरकारी स्कूल-कॉलेज और वकीलों ने अदालतें छोड़ दीं। कई कस्बों-नगरों में श्रमिक हड़तालें छिड़ गईं। 1921 के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 396 हड़तालें हुई जिनमें छह लाख से ज्यादा श्रमिक शामिल हुए और 70 लाख रुपये का नुकसान हुआ था। ग्रामीणों ने लगान देने से मना कर दिया और अनेक जनजातियों ने वन कानूनों की अवहेलना की। कुमाऊं के मजदूरों ने सरकारी अधिकारियों के सामान ढोने से इंकार कर दिया। अकेले बंगाल में लगभग एक लाख विद्यार्थियों ने अपनी पढ़ाई त्याग दी थी। देशभक्तों ने अनेक राष्ट्रीय विद्यालयों और कॉलेजों की स्थापना कीं, जिनमें कई नेता छात्रों-छात्राओं को पढ़ाने लगे थे। 1921 में भारत आगमन पर सभी जगह प्रिन्स ऑफ वेल्स का बहिष्कार हुआ और उन्हें काले झण्डे दिखाये गये। यह हमारे स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास का सर्वाधिक जगमग अध्याय है। दक्षिण अफ्रीका से लौटने के बाद गांधीजी के आह्वान पर छेड़ा गया यह प्रथम जनांदोलन था जिसमें असहयोग की नीति को अपनाया गया था। इसके माध्यम से बापू को देश ने अपना सर्वोच्च सेनापति स्वीकार कर लिया था, जिनके कहने पर आंदोलन हुआ और उनके एक शब्द पर समेट लिया गया। 1857 के बाद यह आजादी के लिये देश की सबसे बड़ी लड़ाई साबित हुई, यद्यपि इसका हश्र भी वैसी ही असफलता के रूप में हुआ। सत्तावन की लड़ाई तो सैन्य पराजय थी, लेकिन असहयोग आंदोलन का समापन एक नैतिक विजय के रूप में हुआ था।

मानवीय और नैतिक मूल्यों से समझौता करने से देश ने इंकार कर दिया और अहिंसा को वरीयता दी थी। 1922 तक ब्रिटिश एंपायर की चूलें हिला देने वाले इस आंदोलन को स्थगित कर दिया क्योंकि फरवरी 1922 में कुछ आंदोलनकारियों ने गोरखपुर के निकट स्थित चौरी-चौरा पुलिस स्टेशन में आग लगा दी थी। इससे 22 पुलिसकर्मी जलकर मर गये। व्यथित गांधीजी ने यह कहकर वह आंदोलन वापस ले लिया कि देश अभी स्वतंत्रता के लिये तैयार नहीं है, जिसके बारे में उन्हें विश्वास था कि यदि यह ठीक से चला तो देश एक वर्ष में स्वतंत्र हो जायेगा। निराश मोतीलाल नेहरू ने कहा था- कन्याकुमारी के एक गांव ने अहिंसा का पालन नहीं किया तो इसकी सजा हिमालय के गांव को क्यों मिले?श् नाराज सुभाषचन्द्र बोस कह उठे थे-उत्साह के चरमोत्कर्ष पर लौटने का आदेश राष्ट्रीय दुर्भाग्य से कम नहीं है। परकाष्ठा पर पहुंचे आन्दोलन को स्थगित करने से गांधी की लोकप्रियता भी घटी पर वे अडोल रहे। इस बाबत गांधीजी ने यंग इण्डिया में लिखा था-आन्दोलन को हिंसक होने से बचाने के लिए मैं हर तरह का अपमान, हर प्रकार का यातनापूर्ण बहिष्कार और मौत भी सहने को तैयार हूं। 13 मार्च, 1922 को बापू को गिरफ्तार कर असंतोष व अराजकता भड़काने के आरोप में 6 साल की सजा सुनाई गई। जस्टिस सीएन ब्रूमफील्ड ने सजा सुनाते हुए कहा था- मैंने आज तक जिनकी जांच की है अथवा करूंगा, आप उन सभी से भिन्न श्रेणी के हैं। लाखों देशवासियों की दृष्टि में आप एक महान देशभक्त और नेता हैं। जो आपसे भिन्न मत रखते हैं, वे भी आपको उच्च आदर्शों और पवित्र जीवन वाले व्यक्ति के रूप में देखते हैं। आगे वे बोले- श्यदि सरकार के लिए सजा में कमी और आपको मुक्त करना संभव हुआ तो मैं सर्वाधिक खुश होऊंगा।श् स्वास्थ्यगत कारणों से बापू 5 फरवरी, 1924 को रिहा हुए। गुजरात के बारडोली में 12 फरवरी, 1922 को कांग्रेस की हुई बैठक में असहयोग आंदोलन को लपेट देने का फैसला हुआ पर इसकी कोख से कालांतर में सविनय अवज्ञा, विदेशी वस्तुओं का बहिष्कार, स्वदेशी, चरखा, आत्मनिर्भरता जैसे आंदोलन निकले, जिन्होंने ब्रितानी हुकूमत को नाकों चने चबवाना जारी रखा था।

इन्हीं आंदोलनों और अभियानों ने हमारे वैचारिक ताने-बाने और तासीर को नये सिरे से रचते हुए भारत को अहिंसक, मानवीय और विवेकपूर्ण समाज बनाया। महात्माजी के अमरीकी जीवनी लेखक लुई फिशर कहते हैं- श्असहयोग भारत और गांधीजी के जीवन के एक युग का ही नाम हो गया। शांति की दृष्टि से तो असहयोग नकारात्मक किन्तु प्रभाव की दृष्टि से अत्यन्त सकारात्मक था। इसके लिए परित्याग और स्व-अनुशासन आवश्यक थे। 1920 के दौरान प्रसिद्ध अमेरिकी मेथडिस्ट ईसाई, मिशनरी धर्मगुरु एवं विचारक डॉ. ई. स्टेनली जोन्स (नोबल पुरस्कार हेतु नामांकित एवं 1963 में श्गांधी शांति पुरस्कारश् से सम्मानित) बापू से दिल्ली के सेंट स्टीफेन कॉलेज में तत्कालीन प्राचार्य रूद्र के निवास पर जब मिले थे, वे असहयोग आन्दोलन की तैयारी कर चुके थे। विभिन्न धर्मों के अलावा स्टेनली ने उनसे अहिंसक असहयोग आन्दोलन को लेकर लम्बी चर्चा की थी। 1968 में श्माई कन्वर्शन टू नॉन-वॉयलेंट नॉन कोऑपरेशन शीर्षक से लिखे एक लेख में स्टेनली ने कहा है कि गांधीजी का अहिंसक असहयोग आन्दोलन किसी एटमी शक्ति के मुकाबले अधिक प्रभावशाली आत्मिक शक्ति है। इस आंदोलन के बारे में जब पूछा जाता था कि असहयोग ही क्यों, तो जवाब में गांधीजी कहते थे- भारत में भारतीयों के सहयोग से ही ब्रिटिशर बस सकते थे। इसलिए अगर भारतीयों ने सहयोग करने से इंकार कर दिया तो हम ब्रिटिश साम्राज्य का पतन कर स्वराज पा सकते हैं। 1920 और आज की परिस्थितियों में अनेक दिलचस्प समानताएं हैं।

फर्क यही है कि उस समय हम विदेशी उपनिवेशवादी शक्ति के खिलाफ उठ खड़े हुए थे, आज हमारी सरकार निरंकुश शासकों का सा व्यवहार कर रही है। जिन कारणों से असहयोग आंदोलन छेड़ा गया था वे ब्रिटिश सरकार द्वारा उत्पन्न की गई थीं। आज निर्वाचित सरकार ही नागरिकों के अधिकार कुचल रही है। कोविड-19 की महामारी और उसके कारण बने हालातों से जूझते असंख्य श्रमिकों, गरीबों और मध्यवर्गीयों के सामने वैसी ही परिस्थितियां उत्पन्न हो गई हैं। सरकार और सत्ता दल नागरिकों की कोई मदद न कर स्वयं मजबूत, खुदगर्ज और समृद्ध हो रहे हैं। देश की आजादी का आंदोलन प्रथम स्वतंत्रता संग्राम (1857) से प्रारंभ होकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना (1885) और श्भारत छोड़ो आंदोलनश् (श्करो या मरोश्- 1942) सहित अनेकानेक संघर्षों से तपता हुआ स्वाधीन भारत के मुकाम पर पहुंचकर दमका है, लेकिन असहयोग आंदोलन का महत्व विशिष्ट है। इसके पहले के आंदोलनों में देश का शरीर शामिल था, दिल था, बुद्धि थीय परंतु उसमें आत्मा उंड़ेलने का काम तो इसी के माध्यम से गांधीजी ने किया था। अगर भारत व उसके नागरिकों को बाहरी ही नहीं, आंतरिक सत्ताधीशों की मनमानी, तानाशाही, निरंकुशता से मुक्त रखना है, तो असहयोग आंदोलन की आत्मा को जाग्रत और चौतन्य बनाये रखना होगा।

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