पूजा मारवाह
जब कोविड-19 से संबंधित काम करने वाली एक सहायता समूह के सदस्य ने सात साल की बच्ची आशा (बदला हुआ नाम) से मुलाकात की तो उस समय वह अपने चार साल के भाई की सुरक्षा कर रही थी। क्योंकि उसके माता-पिता कहीं खाने की व्यवस्था करने गए हुए थे और वह बच्ची बहुत ही धैर्य के साथ उनके लौटने का इंतजार कर रही थी। उस बच्ची ने सहायता समूह के सदस्य को बताया कि वह लोग बिहार के किसी सुदूर ग्रामीण क्षेत्र के रहने वाले मजदूर हैं। सड़क निर्माण करने वाले मजदूरों का यह छोटा सा समूह अब उत्तर प्रदेश के कौशांबी की एक कच्ची आबादी में अस्थायी रूप से निवास कर रहा है, जहां कोरोना के बाद उन्हें दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से उपलब्ध हो पा रही है। उन्हें अपने गांव वापस लौटने की भी उम्मीद नहीं है। श्हमारे पास खाने के पैसे भी नहीं हैं, हम गांव कैसे जा सकते हैं?श् सात साल की इस बच्ची का बहुत आसान जवाब था, लेकिन इसके पीछे कई गंभीर सवाल छुपे हुए थे। जिसका जवाब उस सहायता समूह के सदस्य के पास नहीं था। कोविड-19 के प्रसार को रोकने के लिए देश भर में लगाए गए लॉक डाउन और उसके बाद की परिस्थितियों ने बहुत सारी जिदगियों को बदल कर रख दिया है। विशेषकर गरीबी रेखा से नीचे जीवन बसर कर रहे परिवारों को इसने सबसे अधिक प्रभावित किया है।

लॉक डाउन के दौरान जरूरतमंदों को राशन और स्वास्थ्य किट उपलब्ध कराने के लिए बड़े पैमाने पर काम कर रही संस्था श्चाइल्ड राइट्स एंड यूश् ऐसी बहुत सी कहानियों की गवाह बनी, जो सुनने वालों के दिल को झकझोर कर रख देती है। हम सभी जानते हैं कि लॉक डाउन के दौरान अस्थायी और विस्थापित मजदूरों के पास जीवनयापन का कोई माध्यम नहीं बचा था। काम बंद हो जाने के कारण उनके पास एक वक्त की रोटी का जुगाड़ करना भी मुश्किल हो गया था। इस कठिन समय में उनके बच्चों की मानसिक स्थिति क्या रही होगी, इसका शायद ही किसी ने अंदाजा लगाने का प्रयास किया होगा। माता-पिता के साथ विस्थापन के दौरान बच्चों को सबसे अधिक खाने-पीने की चौलेंजों का सामना करना पड़ा था। उनके सामने न केवल भूख और प्यास का मसला था बल्कि अपने छोटे भाई-बहनों को संभालने की जिम्मेदारी भी उठानी पड़ रही थी। इस दौरान उन्हें उनकी उम्र और क्षमता के अनुरूप भोजन तक उपलब्ध नहीं हो पा रहा था। लॉक डाउन के कारण स्कूलों के बंद होने से गरीब बच्चों को दोपहर का मिलने वाला पौष्टिक भोजन भी बंद हो गया। जिससे इस अवधि में कुपोषण के बढऩे की संभावनाओं ने भी इंकार नहीं किया जा सकता है। इतना ही नहीं, कोरोना की अफरातफरी में बच्चों को समय पर लगने वाले टीके भी नहीं मिल सके हैं जो भविष्य में उन्हें खतरनाक बिमारियों से बचा सकता था।

समेकित बाल विकास कार्यक्रम योजना (आईसीडीएस) और स्वास्थ्य केंद्र कोरोना की रोकथाम के नाम पर पिछले कुछ महीनों से बंद पड़े हैं। जिसके कारण पोलियो वैक्सीन, समय पर लगने वाले टीके, आयरन की गोलियां तथा गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली माताओं तथा उनके बच्चों को दिए जाने वाले पोषण योजना जैसे अन्य महत्वपूर्ण कार्यक्रम ठप्प हो गए हैं। ऐसे में गर्भवती महिलाओं में एनीमिया और खून की कमी तथा बच्चों में कुपोषण की समस्या पर काबू पाने की मुहिम को झटका लग सकता है। इससे भारत को कुपोषण मुक्त करने का लक्ष्य और भी दूर हो जाने की संभावनाएं बढ़ गई हैं। लॉक डाउन के कारण गरीब बस्तियों में सामाजिक स्तर पर साफ-सफाई नहीं होने से टायफायड तथा पानी से होने वाली अधिकतर बिमारियों के बढऩे की आशंका भी बढ़ गई है। बहुत अफसोस की बात है कि बच्चों को भी काम के लिए विस्थापित होना पड़ता है। पढऩे लिखने की उम्र में इन्हें बाल मजदूरी करनी पड़ती है। लेकिन काम के बाद अक्सर इन बच्चों को उनका पारिश्रमिक नहीं दिया जाता है।

बल्कि कई बार इन्हें काम पर लगाने वाले ठेकेदार और बिचौलिए इनका पैसा हड़प जाते हैं। ऐसी कठिन परिस्थिति में इन बच्चों की सुरक्षा को सबसे अधिक खतरा रहता है। क्योंकि इनसे काम करवाने वाले मालिक बाल श्रम कानून से बचने के लिए इनका नाम मजदूरों की लिस्ट में शामिल नहीं करते हैं। यही कारण है कि अक्सर इन तक पहुंचना और उन्हें इस दलदल से बाहर निकालना किसी भी संस्था के लिए बहुत मुश्किल हो जाता है। अपने परिवार के दुखों को देख कर इस परिवेश में रहने वाले बच्चों के व्यक्तित्व और स्वभाव में सामान्य बच्चों की तुलना में काफी अंतर होता है। कई बार ऐसे बच्चे यौन शोषण का भी आसानी से शिकार हो जाते हैं। वहीं मानव तस्कर के चंगुल में भी इनके फंसने की संभावनाएं बहुत अधिक बनी रहती है। लगातार विस्थापन के कारण इन बच्चों की शिक्षा सबसे अधिक प्रभावित होती है। ज्यादातर बच्चे स्कूली शिक्षा पूरी नहीं कर पाते हैं।

ऐसे में या तो परिवार वालों के साथ मजदूरी की आग में झोंक दिए जाते हैं या फिर गलत संगत में आकर अपराध और नशे की दुनिया में शामिल हो जाते हैं। मानसिक रूप से अत्यधिक दबाब के कारण ऐसे वातावरण में पलने वाले बच्चे बहुत जल्द कमजोर और विक्षिप्त अवस्था में भी पहुंच जाते हैं। बार-बार विस्थापन के कारण मजदूरों के बच्चों की शिक्षा बुरी तरह से प्रभावित होती है। बहुत सारे बच्चों का स्कूलों में नामांकन तो होता है लेकिन माता-पिता के विस्थापन के कारण अधिकतर बच्चे स्कूल का मुंह तक देख नहीं पाते हैं। वर्तमान परिस्थिति में लॉक डाउन के बाद विस्थापित मजदूरों के बच्चों की स्कूल से दूरी और भी बढ़ गई है। लॉक डाउन के कारण घर की आर्थिक स्थिति खराब होने तथा ऑनलाइन क्लास की सुविधा से वंचित होने के कारण यह बच्चे मजदूरी की अंधेरी दुनिया में धकेल दिए जायेंगे। इसमें सबसे अधिक शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर बच्चे प्रभावित होंगे।लॉक डाउन के सबब ऑनलाइन सुविधा नहीं होने के कारण गरीब बच्चों की शिक्षा प्रभावित हुई है, इनमें विस्थापित मजदूरों के बच्चों की संख्या लगभग शत प्रतिशत है।

हालांकि लॉक डाउन के कारण सरकारी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों की प्रभावित होती शिक्षा को सामान्य स्तर पर लाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें कई प्रकार की योजनाओं पर काम कर रही हैं। इनमें कम्युनिटी रेडियो और संचार के दूसरे अन्य माध्यमों का सहारा लिया जा रहा है, लेकिन फिर भी लगातार विस्थापित होने वाले बच्चों तक इन माध्यमों की पहुंच बहुत कम मुमकिन हो पाती है। वर्तमान में बच्चों की शिक्षा और उनके सर्वांगीण विकास की सबसे अधिक आवश्यकता है। इसके साथ-साथ उनके पोषण और शारीरिक विकास के लिए भी ठोस योजनाओं पर अमल करने की जरूरत है ताकि उन्हें हर तरह से स्वस्थ्य और विकार रहित जीवन प्रदान किया जा सके। ऐसे में मदद के दौरान उन तक पहुंचाए जा रहे राहत सामग्रियों में दूध, प्रोटीन और अन्य पौष्टिक आहारों को अधिक से अधिक उपलब्ध कराये जाने की जरूरत है। हमें इस बात को समझना होगा कि बिना पका हुआ खाना उनके लिए बहुत अधिक लाभकारी साबित नहीं होगा क्योंकि विस्थापितों के लिए आसानी से रसोई घर की उपलब्धता को सुनिश्चित बनाना मुमकिन नहीं है।इसके अतिरिक्त विस्थापित मजदूरों और उनके बच्चों के लिए साफसफाई तथा शौचालयों की व्यवस्था भी जरूरी है।

इसके लिए राज्य स्तर से लेकर ब्लॉक और पंचायत स्तर तक विस्थापित मजदूरों के लिए बनाये गए अस्थायी बस्तियों में विशेष व्यवस्था करने की जरूरत है। विशेष रूप से इस मामले में लड़कियों के लिए खास इंतजाम करने की जरूरत है ताकि उन्हें किसी भी प्रकार के यौन शोषण से बचाया जा सके। इतना ही नहीं, युवावस्था में प्रवेश करने वाली विस्थापित मजदूरों की बच्चियों के शारीरिक और मानसिक विकास पर खास ध्यान देने की आवश्यकता है। उन्हें न केवल माहवारी संबंधी सही मार्गदर्शन करने की जरूरत है बल्कि कम उम्र में शादी करने से बचाना भी बहुत बड़ी चुनौती होती है।अब समय आ गया है कि विस्थापित होने वाले बच्चों के जीवन में भी रौशनी फैलाई जाए। उन्हें भी अन्य बच्चों की तरह शिक्षा प्राप्त हो। उनके लिए पौष्टिक आहार उपलब्ध हो तथा समय पर स्वास्थ्य के टीके मिल सकें। यह बहुत बड़ा चौलेंज है, जिसे कोई भी संस्था अकेले पूरा नहीं कर सकती है। इसके लिए सरकार और प्रशासन को स्थानीय स्तर पर मिल कर काम करने की जरूरत है क्योंकि एक आम बच्चों की तरह लगातार विस्थापन का दंश झेल रहे मजदूरों के बच्चों को भी सभी सुविधाएं पाने का हक है और यह हक उन्हें हमारा संविधान देता है।


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