खतरनाक दौर से गुजर रहा देश

प्रेम शर्मा
कोरोना संकट अपनी जगह पर है। कोरोना से जनहानि को लेकर किसी प्रकार चर्चा किए बिना देश की अर्थ व्यवस्था पटरी से उतर जाने खतरा अभी टला नही था कि इस बीच पूर्वोत्तर और उत्तर भारत का बड़ा हिस्सा इस वक्त भारी बारिश और बाढ़ की तबाही से जूझ रहा है। उत्तराखंड में बादल फटने से कई मकान जमींदोज हो गए, कुछ लोगों की मौत हो चुकी है, कुछ लापता हैं। उत्तरप्रदेश में घाघरा, सरयू, राप्ती ये तमाम नदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। बिहार में कई जिलों में बाढ़ की तबाही जारी है। उधर चीन के साथ पाकिस्तान और नेपाल को लेकर केन्द्र सरकार के सामने अभी भी संशय जैसी स्थिति विद्यमान है। अब संयुक्त राष्ट्र की एक रिपेार्ट में यह बताया जाना कि भारत के केरल और कर्नाटक प्रांत में आईएस के सहयोगी संगठन हिंद विलयाह के 150 से 200 आतंकवादी मौजूद है। ये भी भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार के है और इनकी योजना भारत में हमले की है जो धारा 370, तीन तलाक और राम मंदिर निर्माण के बदले की भावना का संकेत देता है।जबकि नोटबंदी और कोरोना में लॉकडाउन के चलते डूब रहे बैकों को उबारने का संकट चुनौती के रूप में सरकार के सामने खड़ा है।

कोरोना काल में होटल, विमानन और रियल स्टेट के साथ रेलवे को सबसे ज्यादा आर्थिक संकट उठाना पड़ा है। एनपीए की बढ़ोत्तरी भी देश की आर्थिक स्थिति के लिए बड़ा खतरा सामने दिखाई पड़ रही है। वैस भी इस बॉत की आशंका पहले ही जताई जा रही था कि कोविड 19 ने जिस तरह से समूची अर्थव्यवस्था का पहिया जाम किया है,उसका असर वित्तीय सेक्टर पर साफ दिखने वाला है। आरबीआई ने भी वित्तीय सेक्टर की मजबूती का आकलन करने वाली प्रतिष्ठित फाइनेशियल स्टैबिलिटी रिपोर्ट के माध्यम से इस बॉत पर मुहर लगा दी। छमाही एसबीआर के माध्यम से आरबीआई ने है कि अगर हालात और खराब हुए तो चालू वित्त वर्ष के 8.5 प्रतिशत के स्तर से बढ़कर 12.5 प्रतिशत तक पहुंच सकता है। यही नही हालत और खराब हुई तो एनपीए का स्तर कुल अग्रिम के मुकाबले रिकॉर्ड 14.7 प्रतिशत व सरकारी क्षेत्र के बैंकों के लिए 15 प्रतिशत तक पहुच सकता है। बैंकिंग क्षेत्र का हाल आगामी महीनों में सबसे बुरा होने वाला है। इसकी पुष्टि बैंकों द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक से तीन लाख करोड़ रुपये के कर्ज खातों को पुनर्गठित (रिस्ट्रक्चरिंग) करने की मांग से होती है। मोटे तौर पर ये कर्ज होटल, विमानन और रियल एस्टेट क्षेत्र से जुडेघ् हैं। इन क्षेत्रों को कोरोना की वजह से सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा है। इनके ऋण खातों को पुनर्गठित करने की जरूरत इसलिए भी है, क्योंकि इसके बाद कंपनियों को अनेक तरह से राहत दी जाती है।

कुछ समय के लिए पुनर्गठित खाते गैर-निष्पादित आस्ति (एनपीए) होने से बच जाते हैं और कंपनियों को अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने का मौका मिल जाता है। दरअसल, कंपनी के दिवालिया होने पर बैंक जितनी वसूली कर सकते हैं, उससे कहीं अधिक पैसे उन्हें ऋण खातों के पुनर्गठन से मिलने की उम्मीद होती है। अप्रैल 2020 के अंत तक होटल क्षेत्र पर बैंकों के 45,862 करोड़ रुपये, विमानन क्षेत्र पर 30,000 करोड़ रुपये और रियल एस्टेट क्षेत्र पर 2.3 लाख करोड़ रुपये बकाया थे। इन क्षेत्रों को उबरने में छह महीने से भी ज्यादा समय लग सकता है। रेटिंग एजेंसी इक्रा के मुताबिक, खस्ता हाल विमानन क्षेत्र को अपना अस्तित्व बचाने के लिए आगामी तीन साल में लगभग 35,000 करोड़ रुपये की जरूरत पड़ेगी। आज कई होटल कर्ज में हैं। व्यावसायिक रियल एस्टेट और किराए के कारोबार में भी 25 प्रतिशत से ज्यादा गिरावट के कयास लगाए जा रहे हैं। ऐसे में, इन क्षेत्रों से जुड़े ऋण खातों का पुनर्गठन और जरूरी हो जाता है।बैंकिंग क्षेत्र अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, लेकिन यह क्षेत्र एनपीए की समस्या से जूझ रहा है। दिसंबर 2019 में भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा जारी वित्तीय स्थायित्व रिपोर्ट में कहा गया था कि सितंबर 2020 तक भारतीय अनुसूचित व्यावसायिक बैंकों का एनपीए कुल कर्ज के 9.9 प्रतिशत के स्तर पर पहुंच सकता है। सितंबर 2020 में 53 देशी-विदेशी बैंकों की पूंजी कम हो जाएगी।

बैंकों का मुनाफा कम होगा, जिससे उन्हें ऋण देने में परेशानी होगी। इसके बाद कोरोना को जिस तरह हौव्वा बनाकर देश में एक महौल का सृजन हुआ और लम्बे लॉकडाउन के चलते बेरोजगारी एक चरम पर पहुंची उस संकट से निजात पाने के लिए एक लम्बा अरसा चाहिए। इसी तरह की तमाम और मुसीबतों के बीच केरल और कर्नाटक में बड़ी संख्या में आईएस आतंकी होने की खबर ने देश को एक और खतरे का आभास करा दिया है।संयुक्त राष्ट्र की आतंकवाद संबंधी रपट में यह दर्ज किया जाना गंभीर चिंता का विषय है कि केरल और कर्नाटक में खूंखार आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट यानी आइएस का मजबूत नेटवर्क है। इस पर हैरानी इसलिए नहीं, क्योंकि इन दोनों राज्यों में आइएस के कई सदस्य और समर्थक गिरफ्तार किए जा चुके हैं। ऐसे में कोरोना संकट से निपटने के साथ संयुक्त राष्ट्र की इस रपट को केंद्र सरकार के साथ केरल और कर्नाटक को गंभीरता से लेना चाहिए। इसी के साथ विभिन्न राजनीतिक-गैर राजनीतिक संगठनों को भी चेतना चाहिए। इस मामले में धार्मिक नेताओं की भूमिका अहम है, लेकिन समस्या यह है कि अपने देश में तमाम ऐसे लोग हैं जो या तो इस तरह की रपटों को खारिज करते हैं या फिर आइएस, अलकायदा जैसे आतंकी संगठनों से जुडऩे वालों को भटके हुए लोग बताते हैं। कुछ तो ऐसे हैं कि आइएस के लिए काम करने वालों की गिरफ्तारी की खबर मिलते ही उन्हें निर्दोष बताने का अभियान छेड़ देते हैं।

इससे भी खराब बात यह है कि इस काम में अगुआ बनते हैं तमाम पढ़े-लिखे लोग और साथ ही राजनीतिक एवं धार्मिक नेता। आश्चर्य नहीं कि संयुक्त राष्ट्र की इस रपट को मुसलमानों को बदनाम करने की साजिश बताया जाना लगे। आखिर यह काम पहले होता ही रहा है। ऐसे तत्वों को बेनकाब और हतोत्साहित करने की सख्त जरूरत है। इसमें देरी नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र की रपट यह भी कह रही है कि अफगानिस्तान में अलकायदा की एक टोली में भारत, बांग्लादेश और पाकिस्तान के सदस्य सक्रिय हैं और वे इस क्षेत्र में आतंकी हमलों की साजिश रच रहे हैं। अब ऐसी स्थिति में इस बॉत पर विचार करना होगा कि क्या कोरोना संकट जिस तरह से रिपोर्ट सामने आ रही है। इन रिपोर्ट के विरोध में देश के चंद आयुर्वेदाचार्य इसे वैश्विक मेडिसिन निर्माताओं द्वारा पैदा किया खौफ बताकर इसे केवल अपनी इम्युनिटी बढ़ाकर और सावधानी बरतकर बचाव को महत्वपूर्ण बता रहे तो इस सरकार का पूरा जोर कोरोना पर होना कही से जायज नही है। कोरोना की जॉच कर रहे मशीनों और उनकी विश्वासनियता को लेकर सवाल उठ रहे है। अभी बैक्सीन बनी नही दवाए बनी नही, बनेगी तो किस कीमत पर बिकेगी आदि बहुत से गूढ़ रहस्यों और तिलस्मों के बीच कोरोना के हौव्वा देश की जनता पर इतना हॉवी हो गया कि स्वास्थ बीमा करने वाली कम्पनियों की लाटरी अवश्य खुल गई। कोरोना को लेकर विश्व स्वास्थ संगठन के आए बदलते बयानों ने भी डब्लूएचओं की विश्वसनीयता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है। ऐसे में अब भारत जैसे देश के सामने बाढ़ की विभीषिका, बढ़ती बेरोजगारी को रोकने, बैंकों की बिगड़ती माली हालत सुधारने, देश की जनता में भय का माहौल समाप्त करने से लेकर चीन, पाकिस्तान, नेपाल के षडयंत्र के खतरे से निपटने के साथ अब केरल और कर्नाटक में आईएस आतंकी होने की रिपोर्ट ने भारत के समक्ष एक और मुसीबत खड़ी कर दी है।

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