राजेंद्र शर्मा
मीडिया तथा खासतौर पर टीवी पर नीतिगत प्रश्नों तक जाने वाली कोई भी बहस देख लीजिए, उसमें हमेशा ऐसे विकल्प के लिए रास्ता बंद ही रखा जाता है, जो मौजूदा नवउदारवादी नीतियों या पूंजीवादी आग्रहों के खिलाफ जाता हो। फिर चाहे आत्मनिर्भरता-आत्मनिर्भरता रटते-रटते, अर्थव्यवस्था के ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों पर बहुराष्टड्ढ्रीय निगमों के नियंत्रण के लिए दरवाजे ही क्यों न खोले जा रहे हों। कोविड-19 महामारी के इस दौर में मीडिया की कैसी भूमिका रही है? बेशक, अगर प्रवासी मजदूरों की विपदा देश और दुनिया के सामने आ सकी है और अगर इस निर्मम सरकार को भी, पचास दिन बाद ही सही, किसी हद तक इन मजदूरों की विपदा कम करने के लिए कुछ न कुछ करने के लिए मजबूर किया जा सका है, तो इसका सबसे ज्यादा श्रेय देसी-विदेशी मीडिया के मजदूरों के महापलायन के कवरेज को ही जाता है। बेशक, इसे मीडिया के अपनी भूमिका अदा करने का उदाहरण माना जाएगा। फिर भी यह अपने आप में मौजूदा हालात पर एक तीखी टिप्पणी है कि मीडिया का इस तरह और एक हद तक असरदार तरीके से अपनी भूमिका अदा करना, एक खबर की तरह आता है। अब यह कोई नियम नहीं रहा है। अब तो यह एक अपवाद है। कोरोना के खिलाफ लड़ाई और लॉकडाउन, अब ओपन-1-2 के इस पूरे दौर में, प्रवासी मजदूरों का मुद्दा अकेला मुद्दा है, जिस पर मीडिया सचमुच अपनी भूमिका अदा करता नजर आया है। वर्ना आमतौर पर इस पूरे दौर में मीडिया अपनी वास्तविक भूमिका छोड़कर, सरकार का भोंपू ही बना रहा है।

जाहिर है कि मीडिया ने अपनी पिछली भूमिका को यूं ही नहीं छोड़ दिया है। अपने छरू साल के शासन में मोदी के नेतृत्व में भाजपा और संघ ने जिस तरह मीडिया यानी मुख्यधारा के मीडिया की मुश्कें कसी हैं, उसके बिना यह हरगिज संभव नहीं था। मौजूदा राज में मीडिया को नाथने के लिए साम, दाम, दंड, भेद, सभी हथियारों को खुलकर आजमाया जा रहा है। विज्ञापनों से लेकर हर प्रकार की सरकारी कृपा तक का हथियार बनाया जाना इस खेल का एक ही हिस्सा है। इतना ही महत्वपूर्ण एक और हिस्सा है सत्ताधारी पार्टी व सरकारी तंत्र द्वारा सैकड़ों लोगों की फौज लगाकर, सारे मीडिया की सत्ताधारी पार्टी, सरकार और सबसे बढ़कर प्रधानमंत्री के विरोध के लिए, चौबीसों घंटे मॉनिटरिंग किया जाना और सत्ता पक्ष की हरेक आलोचना को, कार्पोरेट मीडिया मालिकान के सामने, उनके संस्थान के श्गुनाह्य के तौर पर पेश करना। सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों से लेकर संपादकों तक के दबाव डालकर हटवाए जाने और अनुकूल लोगों के बैठवाए जाने के चर्चित किस्सों की भी सूची बहुत लंबी होगी।

इसके ऊपर ने कोरोना की चुनौती के नाम पर और आपदा कानून की आड़ में, मोदी सरकार ने देश पर जिस तरह पूरा तानाशाही राज थोप दिया है, उसी के हिस्से के तौर पर मीडिया की बची-खुची आजादी भी छीन ली गई है। यहां तक कि सरकार के इसके निर्देश पर तो सुप्रीम कोर्ट ने भी मोहर लगा दी थी कि कोरोना के संबंध मेें सरकार के वर्शन को प्रमुखता से पेश किया जाए। लॉकडाउन के दौरान न सिर्फ सरकार के कदमों पर सवाल उठाने के लिए बल्कि सरकारी कार्यक्रमों में भ्रष्टड्ढचार तक के मामले उठाने के लिए भी, असम समेत देश के विभिन्न हिस्सों में पत्रकारों व अन्य मीडिया आउटलैट्स पर राजद्रोह से लेकर राष्टड्ढ्रीय सुरक्षा कानून तक के अंतर्गत मामले बनाए गए हैं। ऐसे में अचरज की बात नहीं है कि सरकार कोरोना की चुनौती से लेकर, अपने कदमों की कमजोरियों तक पर पर्दा डालने में लगी है। और अब तो वह इस महामारी की चुनौती का सामना करने से ही पीछा छुड़ाने के लिए, अन्य-अन्य मुद्दे उछालकर ध्यान बंटाने की कोशिश कर रही है। लेकिन, मीडिया की जिम्मेदारी तो बनती है कि सरकार जिस सच्चाई पर पर्दा डाल रही है, उसे उघाड़े। उससे सवाल करे। उसे जिम्मेदारियां पूरी करने पर मजबूर करे। पर मीडिया वही नहीं कर रहा है। इसी का नतीजा है कि महामारी का मुकाबला करने के लिए विकसित पूंजीवादी देशों तक में जनता की आमदनी की हिफाजत करने और लोगों की जानें बचाने के लिए जो कदम उठाए गए हैं, मोदी सरकार उन कदमों को भी उठाने के लिए तैयार नहीं है। इसके बावजूद, वह अपने कदमों से जनता के संतुष्टड्ढ होने के दावे कर पा रही है। कुछ मीडिया हाउसों ने सर्वे छापकर इस तरह के दावे किए हैं कि कोरोना महामारी से निपटने के मामले में नरेंद्र मोदी सरकार की कारगुजारियों से जनता पूरी तरह से संतुष्टड्ढ है। फिर भी, मीडिया की इससे भी महत्वपूर्ण एक विफलता और है, हालांकि उसकी चर्चा कम ही होती है।

वह यह कि मौजूदा व्यवस्था को लेकर जो असली सवाल इस महामारी ने उठा दिए हैं, उन्हें मीडिया करीब-करीब नहीं ही उठा रहा है। मिसाल के तौर पर हम सब देख रहे हैं कि कैसे मौजूदा पूंजीवादी-नवउदारवादी व्यवस्था, इस महामारी का सामना करने में पूरी तरह से विफल साबित हुई है। और यह विफलता सिर्फ इस व्यवस्था की कमजोर कडिय़ों यानी विकासशील या पिछड़े देशों में ही देखने को नहीं मिल रही है, इस व्यवस्था की अमेरिका जैसी सबसे मजबूत तथा वैचारिक रूप से सबसे मुकम्मल या शुद्घ कडिय़ों में, और भी शानदार तरीके से देखने को मिल रही है। इस अनुभव ने नवउदारवादी पूंजीवाद की निजीकरण की पैरोकारी पर, उसकी बाजार के भरोसे रहने की पैरोकारी पर, बुनियादी सवाल उठा दिए हैं। और कुल मिलाकर नवउदारवादी व्यवस्था के एक ऐसी नाकाम व्यवस्था होने का सवाल उठा दिया है, जो पहले ही बड़े संकट के धक्के से बैठ गई है। लेकिन, मुख्यधारा का मीडिया, भारत के विशिष्टड्ढ संदर्भ में तो भूले से भी इन सवालों को छेड़ता तक नहीं है। और तो और वह तो महामारी के इस संकट के बीच, सारी विफलताओं के बावजूद मोदी सरकार के निजीकरण की मुहिम को खनन से लेकर रक्षा उत्पादन तक, अब तक निजीकरण से सुरक्षित रखे गए क्षेत्रों तक पहुंचाने पर भी, कोई सवाल उठाने या किसी को उठाने देने के लिए भी तैयार नहीं है। और इसका संबंध मुख्यधारा के मीडिया के चरित्र में ही आए बदलाव से है।

कार्पोरेटों के नियंत्रण में मुख्यधारा का मीडिया, आज खुद पूंजीवादी तंत्र का हिस्सा बन चुका है। अब मीडिया के संबंध में मुद्दा यह नहीं है कि वह किस तरह पक्षपात करता है? वह किस तरह संपन्न तबकों की ही सुनता है? कैसे मेहनत मजदूरी करने वाले ही नहीं, मध्य वर्ग के भी बड़े हिस्से उसके राडार से गायब ही हो गए हैं। अब तो मीडिया खुद सत्ताधारी वर्ग का हिस्सा है। यह बात समझने की है कि यह मीडिया पर सत्ताधारी वर्ग के नियंत्रण होने मात्र की बात नहीं है। नियंत्रण में फिर भी नियंत्रक और नियंत्रित यानी जो नियंत्रित करता है और जिसे नियंत्रित किया जाता है, उनके बीच एक अंतर होता है, एक भेद होता है। जो नियंत्रण में है उसका, नियंत्रण करने वाले से, किसी न किसी प्रकार का टकराव भी रहता है। और नियंत्रित किया जाने वाला, नियंत्रण करने वाले के हितों के साथ इतना पूरी तरह से एकरूप या तदाकार शायद ही कभी होता है कि, पूरी तरह से उसके हितों से ही संचालित हो। उल्टे दोनों के बीच एक खुला या छिपा, सुप्त या जाग्रत, तेज या मद्घम, टकराव मौजूद रहता है।

यह अंतर्विरोध नियंत्रणकारी वर्ग के हितों के अलावा भी कुछ न कुछ की गुंजाइश बनाता है। इस गुंजाइश का हमेशा पूरा-पूरा उपयोग हो, यह कोई जरूरी नहीं है। फिर भी यह गुंजाइश रहती जरूर है। और यह गुंजाइश भी हमेशा बहुत थोड़ी ही हो, यह भी कोई जरूरी नहीं है। सामाजिक संतुलन में बदलाव के साथ, यह गुुंजाइश घटती-बढ़ती रहती है। लेकिन, आज की स्थिति इससे गुणात्मक रूप से भिन्न है। मीडिया क्योंकि खुद ही सत्ताधारी वर्ग का हिस्सा बन गया है, यह गुंजाइश ही खत्म हो गई है। मीडिया तथा खासतौर पर टीवी पर नीतिगत प्रश्नों तक जाने वाली कोई भी बहस देख लीजिए, उसमें हमेशा ऐसे विकल्प के लिए रास्ता बंद ही रखा जाता है, जो मौजूदा नवउदारवादी नीतियों या पूंजीवादी आग्रहों के खिलाफ जाता हो। फिर चाहे आत्मनिर्भरता-आत्मनिर्भरता रटते-रटते, अर्थव्यवस्था के ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों पर बहुराष्टड्ढ्रीय निगमों के नियंत्रण के लिए दरवाजे ही क्यों न खोले जा रहे हों।

बेशक, इस दौर में सोशल मीडिया की उपस्थिति भी है। उस पर सत्ताधारी वर्ग का वैसा मुकम्मल नियंत्रण नहीं है। उसके कोनों-अंतरों में दूसरी-दूसरी आवाजों को भी कुछ गुंजाइश मिल जाती है। यानी बहुत बार व्यवहारवादी तरीके से हम सोचते हैं और सही ही सोचते हैं कि ना कुछ से तो कुछ ही सही। थोड़ा ही सही, फिर भी कुछ तो है। और जितना है, उतना ही रहेे यह भी कोई जरूरी नहीं है। अपने प्रयास से, अपने उद्यम से हम उसे बढ़ा भी सकते हैं। यानी सोशल मीडिया में जो भी मौके हैं, अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के, लोगों को प्रभावित करने के, उनका संस्कार करने के, उनका उपयोग तो करना ही करना चाहिए। यह भी एक जरूरी काम है, जिसके महत्व को कम कर के देखने का मतलब है, अपना ही काम मुश्किल बनाना। आखिरकार, जनतंत्र के पक्षधरों का काम लोगों के दिलो-दिमाग को बदलना ही तो है। फिर भी, लोगों के दिलो-दिमाग को जीतने की लड़ाई के मोर्चे या मैदान के रूप में, सोशल मीडिया की सीमाओं को भी याद रखना जरूरी है। मौजूदा सत्ताधारी वर्ग का अगर परंपरागत मीडिया पर लगभग पूरा नियंत्रण है, तो सोशल मीडिया भी उसके नियंत्रण से बाहर नहीं है।

यह नियंत्रण विज्ञापनों के जरिए भी है और नियम-कायदों के जरिए भी। जो सामाजिक मीडिया पर सक्रिय हैं, वे इसमें संघ परिवार के डॉमिनेंस को भी बखूबी जानते हैं। संघ परिवार के लिए यह युद्घ का मैदान है। इस मैदान में वह अपनी विशाल ट्रोल सेना के साथ लड़ रहा है और युद्घ के सारे हरबे-हथियारों के साथ लड़ रहा है। संघ पलटन ने इस युद्घ को एक नये स्तर तक पहुंचा दिया है। ट्रोल सेना के सहारे हरेक भिन्न या विरोधी विचार को कुचलना अगर इसका एक पहलू है, तो सचेत रूप से फेक न्यूज का प्रचार-प्रसार, इसका एक और पहलू है। इसके अलावा फेसबुक, ट्विटर आदि की नीतियों परकृबड़ी पूंजीध् कमाई का नियंत्रण है। मिसाल के तौर पर नस्लवाद आदि मानवविरोधी विचारों, मूल्यों को मंच न देेने की फेसबुक की नीति सचेत रूप से इतनी लचर है कि उसके इस रुख पर जोरदार विरोध दर्ज कराते हुए, अनेक बड़ी बहुराष्टड्ढ्रीय कंपनियों ने पिछले कुछ अर्से में ही एक के बाद एक, फेसबुक से अपने विज्ञापन खींच लिए हैं। इसी प्रकार, खुद हमारे देश में फेसबुक, ट्विटर आदि सोशल मीडिया प्लेटफार्मों द्वारा जातिवादी, सांप्रदायिक, स्त्रीविरोधी आदि संदेशों के न रोके जाने और दूसरी ओर मौजूदा सरकार के प्रति आलोचना की आवाजों को मनमाने तरीके से रोके जाने की, ढेरों शिकायतें सार्वजनिक दायरे में आती रही हैं। इस तरह निष्कर्ष के तौर पर यह कहा जा सकता है कि जैसे कोरोना महामारी के खिलाफ लड़ाई, मौजूदा सरकार के खिलाफ लड़ाई से जुड़ी हुई है, वैसे ही मीडिया के जनतंत्रीकरण की लड़ाई, इसी बड़ी लड़ाई का हिस्सा भी है और इस लड़ाई का एक महत्वपूर्ण मोर्चा भी। इनमें से हरेक मोर्चे पर मजबूती, दूसरे सभी मोर्चों को मजबूत करेगी।


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